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वक़्त-ए-आख़िर हमें दीदार दिखाया न गया | शाही शायरी
waqt-e-aKHir hamein didar dikhaya na gaya

ग़ज़ल

वक़्त-ए-आख़िर हमें दीदार दिखाया न गया

इमदाद अली बहर

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वक़्त-ए-आख़िर हमें दीदार दिखाया न गया
हम तो दुनिया से गए आप से आया न गया

राज़-पोशी से कभी हाथ उठाया न गया
नब्ज़ दिखलाए मरज़ अपना बताया न गया

फूट निकली न रुकी सीने की अंदर ख़ुशबू
मुश्क था दाग़-ए-मोहब्बत कि छुपाया न गया

मेरा दिल किस ने लिया नाम बताऊँ किस का
मैं हूँ या आप हैं घर में कोई आया न गया

हाथ उठा बैठे हम इस ज़िंदगी-ए-शीरीं से
ग़म जुदाई का ये था तल्ख़ कि खाया न गया

जब किया क़स्द कि एहसान किसी का लूँ मैं
आबरू घटने लगी हाथ बढ़ाया न गया

आज वो हाल है अपना जो किसी ने पूछा
हो गए क़ुफ़्ल-ए-दहन-शर्म बताया न गया

रंज पूछा जो मोहब्बत में तो राहत समझे
दुख उठाया कभी दिल उस से उठाया न गया

कुछ न पूछो लब-ए-शीरीं की हलावत हम से
ये वो हल्वा है कभी बाँट के खाया न गया

हैफ़ आँखों ने भी देखी न मिरी तिश्ना-लबी
मुँह में पानी मिज़ा-ए-तरसी चुवाया न गया

ना-तवानी का बुरा हो हम उधर को जो चले
तीव्र आ आ गए गिर गिर पड़े जाया न गया

मग़्ज़ चाटा कभी अंदोज़-ओ-नसीहत वाले
ग़म हमारा किसी ग़म-ख़्वार से खाया न गया

दोस्त कब दोस्त का होता है मुख़िल्ल-ए-राहत
सो गए पाँव तो हाथों से जगाया न गया

कब हरारा दिल-ए-बेताब का रोने से मिटा
शो'ला-ए-बर्क़ कभी मुँह से बुझाया न गया

आमद-ए-यार की क्या क्या न सुनी गर्म ख़बर
उम्र-भर रास्ता देखा कोई आया न गया

जिस के जूया हुए हम ढूँढ निकाला उस को
अक़्ल ग़म है कि मिज़ाज आप का पाया न गया

उस के कूचे से ज़ईफ़ी में भी उठ्ठे न क़दम
सर पे धूप आ गई दीवार का साया न गया

क़त्अ जब से हुई उम्मीद-ए-विसाल-ए-जानाँ
इस तरह बैठ गया दिल कि उठाया न गया

जागना ही मिरी तक़दीर में क्या लिक्खा था
शब-ए-फ़ुर्क़त में अजल से भी सुलाया न गया

क़स्द था 'बहर' का बुत-ख़ाने से काबे की तरफ़
ला-उबाली है ख़ुदा जाने गया या न गया