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वज्द-ए-अहल-ए-कमाल है कुछ और | शाही शायरी
wajd-e-ahl-e-kamal hai kuchh aur

ग़ज़ल

वज्द-ए-अहल-ए-कमाल है कुछ और

मीर मोहम्मदी बेदार

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वज्द-ए-अहल-ए-कमाल है कुछ और
शैख़-साहिब का हाल है कुछ और

होश जाता है अहल-ए-होश का सुन
तेरे मस्तों का हाल है कुछ और

फ़ख़्र-ए-इंसाँ नहीं मलक होना
जी में अपने ख़याल है कुछ और

जिस को कहते हैं वस्ल वस्ल नहीं
मअ'नी-ए-इत्तिसाल है कुछ और

ग़ैर-ए-हर्फ़-ए-नियाज़ सो भी कभू
कह सकूँ हूँ मजाल है कुछ और

रुख़-ए-ख़ुर्शीद पर कहाँ वो नूर
मेरे मह का जमाल है कुछ और

सर्व! दावा-ए-हम-सरी मत कर
वो क़द-ए-नौनिहाल है कुछ और

कब्क तू ख़ुश-ख़िराम है लेकिन
यार की मेरे चाल है कुछ और

देख चल तू भी हालत-ए-'बेदार'
आज उस का तो हाल है कुछ और