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वहशी इश्क़-ए-जुनूँ कम भी नहीं करता है | शाही शायरी
wahshi ishq-e-junun kam bhi nahin karta hai

ग़ज़ल

वहशी इश्क़-ए-जुनूँ कम भी नहीं करता है

अरशद अब्दुल हमीद

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वहशी इश्क़-ए-जुनूँ कम भी नहीं करता है
और यूँ भी है कि अब रम भी नहीं करता है

तोड़ भी लेता है वो रब्त-ए-इनायत हम से
रिश्ता-ए-दर्द को मोहकम भी नहीं करता है

उस का शिकवा नहीं कर सकते कि वो दिल के तईं
ख़ुश नहीं करता तो बरहम भी नहीं करता है

मुझे दीवार-ए-अना से वो गिराता भी नहीं
और ऊँचा मिरा परचम भी नहीं करता है

तबर-ओ-तेग़ हमारी भी धरी है कब से
छेड़ मुद्दत हुई आलम भी नहीं करता है