वहशी इश्क़-ए-जुनूँ कम भी नहीं करता है
और यूँ भी है कि अब रम भी नहीं करता है
तोड़ भी लेता है वो रब्त-ए-इनायत हम से
रिश्ता-ए-दर्द को मोहकम भी नहीं करता है
उस का शिकवा नहीं कर सकते कि वो दिल के तईं
ख़ुश नहीं करता तो बरहम भी नहीं करता है
मुझे दीवार-ए-अना से वो गिराता भी नहीं
और ऊँचा मिरा परचम भी नहीं करता है
तबर-ओ-तेग़ हमारी भी धरी है कब से
छेड़ मुद्दत हुई आलम भी नहीं करता है
ग़ज़ल
वहशी इश्क़-ए-जुनूँ कम भी नहीं करता है
अरशद अब्दुल हमीद

