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वहशतों को भी अब कमाल कहाँ | शाही शायरी
wahshaton ko bhi ab kamal kahan

ग़ज़ल

वहशतों को भी अब कमाल कहाँ

शाहिदा हसन

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वहशतों को भी अब कमाल कहाँ
अब जुनूँ कार-ए-बे-मिसाल कहाँ

ख़ुद से भी माँगती नहीं ख़ुद को
तुझ से फिर ख़्वाहिश-ए-सवाल कहाँ

मेरे हम-रंग पैरहन पहने
शाम ऐसी शिकस्ता-हाल कहाँ

सुब्ह की भीड़ में कहूँ किस से
हो गई रात पाएमाल कहाँ

मेरी सब हालातों को जान सके
कोई ऐसा शरीक-ए-हाल कहाँ

तेरे ख़्वाबों के बा'द आँखों में
हो सके रौशनी बहाल कहाँ

बे-इरादा जो बख़्श दी तू ने
इस ख़ुशी का तुझे ख़याल कहाँ

ढूँडते ढूँडते मैं थक भी गई
खो गए मेरे माह-ओ-साल कहाँ