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वहशत में सू-ए-दश्त जो ये आह ले गई | शाही शायरी
wahshat mein su-e-dasht jo ye aah le gai

ग़ज़ल

वहशत में सू-ए-दश्त जो ये आह ले गई

आसिफ़ुद्दौला

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वहशत में सू-ए-दश्त जो ये आह ले गई
क्या क्या कुएँ झुकाने तिरी चाह ले गई

आए कभी न राह पे क्या जानिए हमें
कीधर को ये तबीअ'त गुमराह ले गई

काबे में भी गए तो हमें तेरी याद आह
फिर सू-ए-दैर ऐ बुत-ए-दिल-ख़्वाह ले गई

उस ने कहाँ बुलाया था ये इस के घर हमें
नाहक़ ज़बान-ए-ख़ल्क़ की अफ़्वाह ले गई

जारूब-कश ने उस के न रहने दिया मुझे
गर्दां नसीम शक्ल-ए-पर-ए-काह ले गई

जूँ तीर दिल से आह जो निकले तो क्या कहूँ
बस जान को भी अपने वो हमराह ले गई

'आसिफ़' चमन में आते ही उस रश्क-ए-गुल की याद
क्या जानिए किधर मुझे नागाह ले गई