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वहशत-ए-ग़म में सुकूँ ज़ीस्त को मिलता भी कहाँ | शाही शायरी
wahshat-e-gham mein sukun zist ko milta bhi kahan

ग़ज़ल

वहशत-ए-ग़म में सुकूँ ज़ीस्त को मिलता भी कहाँ

ऐन सलाम

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वहशत-ए-ग़म में सुकूँ ज़ीस्त को मिलता भी कहाँ
था बयाबान में दीवार का साया भी कहाँ

एक मुद्दत से न याद आई न जाँ तड़पी है
दिल तुझे भूल गया हो मगर ऐसा भी कहाँ

हुस्न भी वो न रहा पहला सा दिलदार-ए-हुनर
आह पहली सी वो अब अज़्मत-ए-तेशा भी कहाँ

मस्लहत-बीं है अगर इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा तो क्या
अब वो पहले की तिरा वुसअ'त-ए-सहरा भी कहाँ

कोई मंज़िल ही न थी मंज़िल-ए-ग़म से आगे
क़ाफ़िला अपनी तमन्नाओं का रुकता भी कहाँ

ग़ैर-महदूद ख़लाओं में सफ़र करता हूँ
और रसाई का ये आलम है कि भटका भी कहाँ

निकहत-ओ-नूर से मा'मूर फ़ज़ा है फिर भी
तो कि इस राहगुज़र से अभी गुज़रा भी कहाँ

हरम-ओ-दैर से ये सर जो कशीदा आया
झुक गया दर पे तिरे और ये झुकता भी कहाँ

ख़ाक उड़ाता है अभी दश्त-ए-तलब ही में 'सलाम'
दिल-ए-रुस्वा ये हुआ है अभी रुस्वा भी कहाँ