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वहशत-ए-दिल ने कहीं का भी न रक्खा मुझ को | शाही शायरी
wahshat-e-dil ne kahin ka bhi na rakkha mujhko

ग़ज़ल

वहशत-ए-दिल ने कहीं का भी न रक्खा मुझ को

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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वहशत-ए-दिल ने कहीं का भी न रक्खा मुझ को
देखना है अभी क्या कहती है दुनिया मुझ को

असर-ए-क़ैद-ए-तअ'य्युन से भी आज़ाद है दिल
किस तरह बंद-ए-अलाएक़ हो गवारा मुझ को

लेने भी दे अभी मौज लब-ए-साहिल के मज़े
क्यूँ डुबोती है उभरने की तमन्ना मुझ को

ख़्वाहिश-ए-दिल थी कि मिलता कहीं सौदा-ए-जुनूँ
मैं ने क्या माँगा था क़िस्मत ने दिया क्या मुझ को

तेरी बे-पर्दगी-ए-हुस्न ने आँखें खोलीं
तंग-दामानी-ए-नज़्ज़ारा थी पर्दा मुझ को

आख़िरी दौर में मदहोश हुआ था लेकिन
लग़्ज़िश-ए-पा ने मिरी ख़ूब सँभाला मुझ को

उम्र सारी तो कटी दैर-ओ-हरम में ऐ 'शौक़'
इस पे सज्दा भी तो करना नहीं आया मुझ को