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वहशत-ए-दिल का अजब रंग नज़र आता है | शाही शायरी
wahshat-e-dil ka ajab rang nazar aata hai

ग़ज़ल

वहशत-ए-दिल का अजब रंग नज़र आता है

अज़ीज़ हैदराबादी

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वहशत-ए-दिल का अजब रंग नज़र आता है
अर्सा-ए-हश्र मुझे तंग नज़र आता है

दोनों जानिब है बराबर तिरी तस्वीर का रुख़
आईना मेरी तरह दंग नज़र आता है

कुछ तो सय्याद ने कुछ बाद-ए-सबा ने लूटा
आशियाने का अजब रंग नज़र आता है

सुल्ह-जूई की तमन्ना में शब-ओ-रोज़ 'अज़ीज़'
यक जहाँ मुज़्तरिब-ए-जंग नज़र आता है