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वही कसीफ़ घटाएँ वही भयानक रात | शाही शायरी
wahi kasif ghaTaen wahi bhayanak raat

ग़ज़ल

वही कसीफ़ घटाएँ वही भयानक रात

मुईन अहसन जज़्बी

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वही कसीफ़ घटाएँ वही भयानक रात
सहर से जैसे गुरेज़ाँ हों आज भी लम्हात

वही जफ़ाएँ वही सख़्तियाँ वही आफ़ात
तुम्हीं बताओ कि बदले कहाँ मिरे दिन रात

ये बर्क़ ओ बाद की यूरिश ये ज़हर की बारिश
मिली है अहल-ए-चमन को बहार की सौग़ात

दिलों में आग निगाहों में आग बातों में आग
कभी तो यूँ भी निकलती है ग़म-ज़दों की बरात

कभी कभी तो ज़मीं आसमाँ चमक उट्ठे
कभी कभी तो दहक उट्ठे ख़ाक के ज़र्रात

ख़िज़ाँ-रसीदा चमन आग हो गए 'जज़्बी'
हमारे दीदा-ए-पुर-ख़ूँ में थी मगर कुछ बात