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वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ | शाही शायरी
wahi ek fareb hasrat ki tha baKHshish-e-nigaran

ग़ज़ल

वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

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वही इक फ़रेब हसरत कि था बख़्शिश-ए-निगाराँ
सो क़दम क़दम पे खाया ब तरीक़-ए-पुख़्ता-काराँ

वो चले ख़िज़ाँ के डेरे कि है आमद-ए-बहाराँ
शब-ए-ग़म के रह-नशीनों कहो अब सलाह-ए-याराँ

मिरे आशियाँ का क्या है मिरा आसमाँ सलामत
हैं मिरे चमन की रौनक़ यही बर्क़-ओ-बाद-ओ-बाराँ

न सही पसंद-ए-हिकमत ये शिआ'र-ए-अहल-ए-दिल है
कभी सर भी दे दिया है ब-सलाह-ए-दोस्त-दाराँ

रहे हुस्न बन के आख़िर जो ख़याल उधर से गुज़रे
ये किधर की चाँदनी थी सर-ए-ख़ाक-ए-रह-ए-गुज़ाराँ

मिरे एक दिल की ख़ातिर ये कशाकश-ए-हवादिस
तिरे एक ग़म के बदले ये हुजूम-ए-ग़म-गुसाराँ

मिरी वहशतों ने जिस को न बना के राज़ रक्खा
वही राज़ है कि अब तक है मियान-ए-राज़दाराँ

किसी मनचले ने भेजा है मय-ए-सुख़न से भर कर
कि ये साग़र-ए-दिल-अफ़ज़ा है ये नज़्र-ए-दिल-निगाराँ