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वफ़ा-शिआ'र को तू ने ज़लील-ओ-ख़्वार किया | शाही शायरी
wafa-shiar ko tu ne zalil-o-KHwar kiya

ग़ज़ल

वफ़ा-शिआ'र को तू ने ज़लील-ओ-ख़्वार किया

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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वफ़ा-शिआ'र को तू ने ज़लील-ओ-ख़्वार किया
जफ़ा-परस्त ये क्या शेवा इख़्तियार किया

उठाए से न उठा दिल का पर्दा-ए-ग़फ़लत
ख़ता हुई कि उन आँखों पे ए'तिबार किया

निगाह-ए-मस्त-ए-हक़ीक़त तो दे चुकी थी जवाब
मगर ये दिल ही था फिर उस ने होशियार किया

न वो तड़प रही दिल में न वो रही सोज़िश
इलाज क्या था ये क्या तू ने ग़म-गुसार किया

दिखा के जल्वा-ए-बातिल की इक झलक ऐ हुस्न
ख़ुदा के बंदा को नाहक़ गुनाहगार किया

किसी के बस का दिल-ए-मुज़्तरिब न था लेकिन
हमीं ने ख़ूगर-ए-अंदोह-ए-इंतिज़ार किया

ख़याल-ए-इश्क़ ने रहमत से भी रखा महरूम
ये क्या किया कि गुनाहों पे ए'तिबार किया

कहे में आ के दिल-ए-ना-सुबूर के हम ने
तमाम शब तिरे आने का इंतिज़ार किया

तुम्हें तो ख़ाक में मिलना था मिल गए आख़िर
जहाँ में शौक़ अबस उन को शर्मसार किया