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वफ़ा की राह में ऐसे कमाल करती हूँ | शाही शायरी
wafa ki rah mein aise kamal karti hun

ग़ज़ल

वफ़ा की राह में ऐसे कमाल करती हूँ

ज्योती आज़ाद खतरी

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वफ़ा की राह में ऐसे कमाल करती हूँ
न कोई शिकवा न कोई सवाल करती हूँ

मैं रोज़ तारों से दामन सजाती हूँ अपना
बहुत सलीक़े से अपना ख़याल करती हूँ

ये कब तलक यूँ ही नफ़रत का खेल खेलोगे
मैं लीडरों से यही इक सवाल करती हूँ

ग़मों को अपनी मैं ग़ज़लों में ढालती हूँ बस
ये दुनिया वाले कहे कि कमाल करती हूँ

उदासियों से सदा रख के फ़ासले 'ज्योति'
मैं ऐसे ज़ीस्त हसीं पुर-जमाल करती हूँ