वफ़ा का ताना-बाना ढूँढता है
न जाने क्या दिवाना ढूँढता है
हवस उस की फ़लक से भी है ऊँची
वो तारों का ख़ज़ाना ढूँढता है
घनी छाँव पकड़ लेती है पाँव
मुसाफ़िर दिल ठिकाना ढूँढता है
किसी के सामने वो सर झुके क्या
जो तेरा आस्ताना ढूँढता है
उड़े पंछी ख़ला में जितना ऊँचा
ज़मीं पर आब-ओ-दाना ढूँढता है
ख़िरद से होगी दिल की पासबानी
कि तीर-ए-दिल निशाना ढूँढता है
वो दे दे कर मुझे ज़ेहनी अज़िय्यत
बदन पर ताज़ियाना ढूँढता है
वो अपनी ज़ात में मुदग़म है 'सैफ़ी'
उसे सारा ज़माना ढूँढता है
ग़ज़ल
वफ़ा का ताना-बाना ढूँढता है
मुनीर सैफ़ी

