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वाँ तबीअत दम-ए-तक़रीर बिगड़ जाती है | शाही शायरी
wan tabiat dam-e-taqrir bigaD jati hai

ग़ज़ल

वाँ तबीअत दम-ए-तक़रीर बिगड़ जाती है

ज़हीर देहलवी

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वाँ तबीअत दम-ए-तक़रीर बिगड़ जाती है
बात की बात में तौक़ीर बिगड़ जाती है

चौंक पड़ता हूँ ख़ुशी से जो वो आ जाते हैं
ख़्वाब में ख़्वाब की ताबीर बिगड़ जाती है

कुछ वो पढ़ने में उलझते हैं मिरा नामा-ए-शौक़
कुछ इबारत दम-ए-तहरीर बिगड़ जाती है

चारा-गर क्या मिरी वहशत से जुनूँ भी है ब-तंग
रोज़ मुझ से मिरी ज़ंजीर बिगड़ जाती है

दाग़-ए-उल्फ़त वो बुरी शय है कि कहने से 'ज़हीर'
महर-ओ-महताब की तनवीर बिगड़ जाती है