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उट्ठी है जब से दिल में मिरे इश्क़ की तरंग | शाही शायरी
uTThi hai jab se dil mein mere ishq ki tarang

ग़ज़ल

उट्ठी है जब से दिल में मिरे इश्क़ की तरंग

शाह आसिम

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उट्ठी है जब से दिल में मिरे इश्क़ की तरंग
शादी ओ ग़म हैं आगे मिरे दोनों एक रंग

जब से हुआ हूँ बादा-ए-तौहीद से मैं मस्त
उठती है दिल से नग़्मा-ए-मंसूर की उमंग

दिल अंदरून-ए-सीना मगर हो गया है ख़ून
निकले हैं मेरी आँखों से जो अश्क सुर्ख़ रंग

पहुँचे है तीर-ए-आह मिरा अर्श के परे
जब से लगा है दिल में मिरे इश्क़ का ख़दंग

नैरंगियाँ तिरी हैं हुई जैसे जल्वा-गर
होश-ओ-हवास-ओ-अक़्ल-ए-रसा जुमला हैं ये दंग

इक बार गर वो देखे तिरे रुख़ को बे-नक़ाब
काबा-परस्त होवे वहीं पर बुत-ए-फ़रंग

कर नाम-ओ-नंग तर्क दिला राह-ए-इश्क़ में
आशिक़ वही है जिस को कि है इस से आर-ओ-नंग

मत रख तू बहर-ए-इश्क़ में ऐ बुल-हवस क़दम
हर क़तरे में यहाँ हैं बला के दो सद नहंग

'आसिम' मैं क्या करूँ शह-ए-ख़ादिम की अब सना
है पा-ए-अक़्ल अर्सा-ए-मिदहत में उस के लंग