उट्ठा है अब्र जोश का आलम लिए हुए
बैठा हूँ मैं भी दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
साक़ी की चश्म-ए-मस्त का आलम न पूछिए
इक इक निगाह है कई आलम लिए हुए
शबनम नहीं गुलों पे ये क़तरे हैं अश्क के
गुज़रा है कोई दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
तय कर रहा हूँ इश्क़ की दुश्वार मंज़िलें
आह-ए-दराज़ ओ गिर्या-ए-पैहम लिए हुए
उठ ऐ नक़ाब-ए-यार कि बैठे हैं देर से
कितने ग़रीब दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
सुनता हूँ उन की बज़्म में छलकेंगे आज जाम
मैं भी चला हूँ दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
मोती की क़द्र सब को है फूलों को देखिए
क्या हँस रहे हैं क़तरा-ए-शबनम लिए हुए
जोश-ए-जुनूँ में लुत्फ़-ए-तसव्वुर न पूछिए
फिरते हैं साथ साथ उन्हें हम लिए हुए
दिल की लगी न उन से बुझी आज तक 'जलील'
दरिया हैं गरचे दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
ग़ज़ल
उट्ठा है अब्र जोश का आलम लिए हुए
जलील मानिकपूरी

