EN اردو
उट्ठा है अब्र जोश का आलम लिए हुए | शाही शायरी
uTTha hai abr josh ka aalam liye hue

ग़ज़ल

उट्ठा है अब्र जोश का आलम लिए हुए

जलील मानिकपूरी

;

उट्ठा है अब्र जोश का आलम लिए हुए
बैठा हूँ मैं भी दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए

साक़ी की चश्म-ए-मस्त का आलम न पूछिए
इक इक निगाह है कई आलम लिए हुए

शबनम नहीं गुलों पे ये क़तरे हैं अश्क के
गुज़रा है कोई दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए

तय कर रहा हूँ इश्क़ की दुश्वार मंज़िलें
आह-ए-दराज़ ओ गिर्या-ए-पैहम लिए हुए

उठ ऐ नक़ाब-ए-यार कि बैठे हैं देर से
कितने ग़रीब दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए

सुनता हूँ उन की बज़्म में छलकेंगे आज जाम
मैं भी चला हूँ दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए

मोती की क़द्र सब को है फूलों को देखिए
क्या हँस रहे हैं क़तरा-ए-शबनम लिए हुए

जोश-ए-जुनूँ में लुत्फ़-ए-तसव्वुर न पूछिए
फिरते हैं साथ साथ उन्हें हम लिए हुए

दिल की लगी न उन से बुझी आज तक 'जलील'
दरिया हैं गरचे दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए