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उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें | शाही शायरी
uTho zamane ke aashob ka izala karen

ग़ज़ल

उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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उठो ज़माने के आशोब का इज़ाला करें
ब-नाम-ए-गुल-बदनाँ रुख़ सू-ए-पियाला करें

ब-याद-ए-दीदा-ए-मख़्मूर पुर-पियाला करें
उठो कि ज़हर का फिर ज़हर से इज़ाला करें

वो रिंद हैं न उठाएँ बहार का एहसाँ
वरूद हम तिरी ख़ल्वत में बे-हवाला करें

कहाँ के दैर ओ हरम आओ एक सज्दा-ए-शौक़
बपा-ए-होश-ए-रुबायान-ए-बस्त-साला करें

बरस पड़े जो गुलिस्ताँ में उस नज़र से शराब
बहक बहक के हम आगे सुबू-ए-लाला करें

सुबू उठा कि गदायान-ए-कू-ए-मय-ख़ाना
तिरे हवाले मह-ओ-मेहर का क़बाला करें

हदीस-ए-ज़ोहद हो या वारदात-ए-ज़हरा-मिसाल
किसी के नाम को हम ज़ेब-ए-हर-मक़ाला करें

दिखा सहीफ़ा-ए-रुख़ इस तरह कि अहल-ए-बहार
वरक़ वरक़ ब-ख़जालत बयाज़-ए-लाला करें

उठो जला के मय-ए-सुर्ख़ से चराग़-ए-अबद
नशात-ए-सोहबत-ए-शब को हज़ार-साला करें

अदा वो नीची निगाहों की है कि जैसे 'ज़फ़र'
तलाश-ए-कुंज-ए-ग़ज़ालान-ए-ख़ुर्द-साला करें