उठाओ लौह-ओ-क़लम हादसे तमाम लिखूँ
रवाँ सदी में हुआ है जो क़त्ल-ए-आम लिखूँ
नसीम-ए-सुब्ह इबारत है तेरी ख़ुश्बू से
सबा की नर्म-रवी को तिरा ख़िराम लिखूँ
उलझती साँसों की तफ़्सीर ख़ूँ-चकाँ नग़्मा
सुकूत टूट भी जाए तो किस के नाम लिखूँ
हरीम-ए-ज़ात फ़रोज़ाँ है जिस के परतव से
उसी झलक को उफ़ुक़ पर मह-ए-तमाम लिखूँ
कोई तो सुब्ह-ए-रिफ़ाक़त से कर सकूँ ता'बीर
कोई तो शाम तिरे साथ अपने नाम लिखूँ
छलक रही है सुबूही क़दम की लग़्ज़िश से
सियाह चश्म की गर्दिश को दौर-ए-जाम लिखूँ
अजब इशारे हैं नीची निगाह के 'इशरत'
वो जितने रंज भी दे ख़ुद को शाद-काम लिखूँ
ग़ज़ल
उठाओ लौह-ओ-क़लम हादसे तमाम लिखूँ
इशरत क़ादरी

