उश्शाक़ तेरे सब थे पर ज़ार था सो मैं था
जग के ख़राबा अंदर इक ख़्वार था सो मैं था
दाख़िल शहीदों में तो लोहू लगा के सब थे
शमशीर-ए-नाज़ से पुर-अफ़गार था सो मैं था
सुम्बुल के पेच में दिल तेरे न था किसी का
नर्गिस का एक तेरी बीमार था सो मैं था
तुझ घर में अर्ज़-ए-मतलब किस की न था ज़बाँ पर
दर पर जो तेरे नक़्श-ए-दीवार था सो मैं था
दाग़-ए-मोहब्बत ऐ गुल जब था तिरा न जग में
दाग़ों से जिस का सीना गुलज़ार था सो मैं था
गो इश्क़ के तुम्हारे उश्शाक़ अब मुक़िर हैं
अव्वल ज़बाँ पे जिस की इक़रार था सो मैं था
तुझ इश्क़ में नसीहत सब यार मानते थे
नासेह के पर सुख़न से बे-ज़ार था सो मैं था
इस मय-कदे में गाहे ऐ 'सोज़' हम न बहके
सब मस्त ओ बे-ख़बर थे हुश्यार था सो मैं था
ग़ज़ल
उश्शाक़ तेरे सब थे पर ज़ार था सो मैं था
मीर सोज़

