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उसे यक़ीन न आया मिरी कहानी पर | शाही शायरी
use yaqin na aaya meri kahani par

ग़ज़ल

उसे यक़ीन न आया मिरी कहानी पर

सिद्दीक़ मुजीबी

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उसे यक़ीन न आया मिरी कहानी पर
वो नक़्श ढूँड रहा था गुज़रते पानी पर

सफ़ीने थक के तह-ए-आब हो गए सारे
हुनर खिला न हवाओं का बादबानी पर

मैं सख़्त-जान था ऐसा कि चीख़ भी न सका
फ़ुग़ाँ फ़ुग़ाँ थी जहाँ मर्ग-ए-ना-गहानी पर

मैं आसमाँ को समझता रहा हरीफ़ अपना
गया न ध्यान कभी उस की बे-करानी पर

'मुजीबी' चुप सी ये क्यूँ लग गई ज़माने को
कहाँ गए वो जो नाज़ाँ थे ख़ुश-बयानी पर