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उसे क्यूँ सहर से नशात हो उसे क्या मलाल हो शाम से | शाही शायरी
use kyun sahar se nashat ho use kya malal ho sham se

ग़ज़ल

उसे क्यूँ सहर से नशात हो उसे क्या मलाल हो शाम से

अज़ीज़ वारसी

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उसे क्यूँ सहर से नशात हो उसे क्या मलाल हो शाम से
जिसे इश्क़ है तिरे ज़िक्र से जिसे उन्स है तिरे नाम से

वो तुम्हारे तौर-ओ-तरीक़ थे कि हज़ार रंग बदल लिए
ये हमारे दिल का शुऊ'र है न हटे हम अपने मक़ाम से

मिरी आरज़ू के चराग़ पर कोई तब्सिरा भी करे तो क्या
कभी जल उठा सर-ए-शाम से कभी बुझ गया सर-ए-शाम से

जो हयात-ए-इश्क़ सँवर गई तो हयात-ए-हुस्न निखर गई
कभी तेरे हुस्न-ए-ख़िराम से कभी मेरे सोज़-ए-दवाम से

जो 'अज़ीज़-वारसी' था कभी वो 'अज़ीज़-वारसी' अब नहीं
न जुनून-ए-इश्क़-ए-बुताँ है अब न ग़रज़ है बादा-ओ-जाम से