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उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की | शाही शायरी
usne kyun sab se juda meri pazirai ki

ग़ज़ल

उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की

अफ़ीफ़ सिराज

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उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की
मस्लहत-कोश थी हर बात शनासाई की

ज़ख़्म-ए-दिल हम ने सजाए तो इधर भी उस ने
नाज़-ओ-अंदाज़ से जारी सितम-आराई की

जिस्म तरशा हुआ साँचे में ढला है जैसे
दस्त-ए-आज़र ने क़सम खाई हो सन्नाई की

ऐसा सैराब किया उस ने कि ख़ुद तिश्ना-लबी
इक सनद बन गई तारीख़ में सक़्क़ाई की

शुक्र है ऐ शब-ए-हिज्राँ कि बड़ी मुद्दत पर
हो गई दिल से मुलाक़ात भी बीनाई की

शुक्रिया तुम ने बुझाया मिरी हस्ती का चराग़
तुम सज़ा-वार नहीं तुम ने तो अच्छाई की