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उस की पहले से थी नज़र शायद | शाही शायरी
uski pahle se thi nazar shayad

ग़ज़ल

उस की पहले से थी नज़र शायद

प्रेम भण्डारी

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उस की पहले से थी नज़र शायद
जिस की मुझ को ख़बर न थी शायद

गूँगा आँगन है बहरी दीवारें
ये ख़राबा है अपना घर शायद

चल के कुछ दूर रुक गए हैं वो
न मिला मुझ सा हम-सफ़र शायद

हिज्र की रात इतनी लम्बी है
जैसे होगी न अब सहर शायद

रंग तेरा उड़ा उड़ा सा है
लग गई है तुझे नज़र शायद