उस की पहले से थी नज़र शायद
जिस की मुझ को ख़बर न थी शायद
गूँगा आँगन है बहरी दीवारें
ये ख़राबा है अपना घर शायद
चल के कुछ दूर रुक गए हैं वो
न मिला मुझ सा हम-सफ़र शायद
हिज्र की रात इतनी लम्बी है
जैसे होगी न अब सहर शायद
रंग तेरा उड़ा उड़ा सा है
लग गई है तुझे नज़र शायद
ग़ज़ल
उस की पहले से थी नज़र शायद
प्रेम भण्डारी

