उस के कूचे से सबा गर इधर आ जाती है
दिल के नालों की मुफ़स्सल ख़बर आ जाती है
गरचे उस ज़ुल्फ़ से कुछ काम नहीं अब तो वले
साँप के काटे की सी इक लहर आ जाती है
मेरे होते ही तुम्हें ग़ैर से थी करनी बात
दिल में कुछ कुछ फिर इसी बात पर आ जाती है
ये ग़ज़ब है कि वो रूठा हुआ फिरता है जो याँ
ख़्वाब में भी वही सूरत नज़र आ जाती है
ज़िक्र छेड़े कोई अब क्यूँकि मिरा उस के हुज़ूर
वाँ तो हर बात में तेग़-ओ-सिपर आ जाती है
सूझता कुछ नहीं उस वक़्त मियाँ अपने तईं
याद जिस वक़्त तिरी मू कमर आ जाती है
काट देता है वो हर बात में सुनता ही नहीं
बात मेरी कभी मज्लिस में गर आ जाती है
इक वफ़ादारी जो है आब-ओ-गिल अपने में 'हसन'
फिर तबीअत नहीं फिरती जिधर आ जाती है
ग़ज़ल
उस के कूचे से सबा गर इधर आ जाती है
मीर हसन

