उस कमर के ख़याल में हैं हम
बैठे करते हैं सैर-ए-मुल्क-ए-अदम
बे-ख़ुदी हम पे रखियो लुत्फ़-ओ-करम
अपने तईं भूल जाएँ जब तक हम
क्यूँ गुनहगार हो न नौ-ए-बशर
पहले ही चूके हज़रत-ए-आदम
आह इस बहर में हबाब की तरह
अपनी भी ज़िंदगी है कोई दम
दी है धूनी दर-ए-तवक्कुल पर
छोड़ दी हम ने मिन्नत-ए-आलम
देखने भी न पाए क़ातिल को
ज़ख़्म इतने ही लग गए पैहम
नील-गूँ क्यूँ न हो हिसार-ए-रंग
है सियह-पोश ख़ाना-ए-मातम
लुत्फ़ होता जो ऐश में 'जोशिश'
छोड़ देता न सल्तनत अदहम
ग़ज़ल
उस कमर के ख़याल में हैं हम
जोशिश अज़ीमाबादी

