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उस कमर के ख़याल में हैं हम | शाही शायरी
us kamar ke KHayal mein hain hum

ग़ज़ल

उस कमर के ख़याल में हैं हम

जोशिश अज़ीमाबादी

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उस कमर के ख़याल में हैं हम
बैठे करते हैं सैर-ए-मुल्क-ए-अदम

बे-ख़ुदी हम पे रखियो लुत्फ़-ओ-करम
अपने तईं भूल जाएँ जब तक हम

क्यूँ गुनहगार हो न नौ-ए-बशर
पहले ही चूके हज़रत-ए-आदम

आह इस बहर में हबाब की तरह
अपनी भी ज़िंदगी है कोई दम

दी है धूनी दर-ए-तवक्कुल पर
छोड़ दी हम ने मिन्नत-ए-आलम

देखने भी न पाए क़ातिल को
ज़ख़्म इतने ही लग गए पैहम

नील-गूँ क्यूँ न हो हिसार-ए-रंग
है सियह-पोश ख़ाना-ए-मातम

लुत्फ़ होता जो ऐश में 'जोशिश'
छोड़ देता न सल्तनत अदहम