उस का लहजा किताब जैसा है
और वो ख़ुद गुलाब जैसा है
धूप हो चाँदनी हो बारिश हो
एक चेहरा कि ख़्वाब जैसा है
बे-हुनर शोहरतों के जंगल में
संग भी आफ़्ताब जैसा है
भूल जाओगे ख़ाल-ओ-ख़द अपने
आइना भी सराब जैसा है
वस्ल के रंग भी बदलते थे
हिज्र भी इंक़लाब जैसा है
याद रखना भी तुझ को सहल न था
भूलना भी अज़ाब जैसा है
बे-सितारा है आसमाँ तुझ बिन
और समुंदर सराब जैसा है
ग़ज़ल
उस का लहजा किताब जैसा है
जाज़िब क़ुरैशी

