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उस का लहजा किताब जैसा है | शाही शायरी
us ka lahja kitab jaisa hai

ग़ज़ल

उस का लहजा किताब जैसा है

जाज़िब क़ुरैशी

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उस का लहजा किताब जैसा है
और वो ख़ुद गुलाब जैसा है

धूप हो चाँदनी हो बारिश हो
एक चेहरा कि ख़्वाब जैसा है

बे-हुनर शोहरतों के जंगल में
संग भी आफ़्ताब जैसा है

भूल जाओगे ख़ाल-ओ-ख़द अपने
आइना भी सराब जैसा है

वस्ल के रंग भी बदलते थे
हिज्र भी इंक़लाब जैसा है

याद रखना भी तुझ को सहल न था
भूलना भी अज़ाब जैसा है

बे-सितारा है आसमाँ तुझ बिन
और समुंदर सराब जैसा है