उस का जल्वा जो कोई देखने वाला होता
वादा-ए-दीद क़यामत पे न टाला होता
बाम पर थे वो खड़े लुत्फ़ दो-बाला होता
मुझ को भी दिल ने उछल कर जो उछाला होता
कैसे ख़ुश-रंग हैं ज़ख़्म-ए-जिगर ओ दाग़-ए-जिगर
हम दिखाते जो कोई देखने वाला होता
दिल न सँभला था अगर देख के जल्वा उस का
तू ने ऐ दर्द-ए-जिगर उठ के सँभाला होता
तुम जो पर्दे में सँवरते हो नतीजा क्या है
लुत्फ़ जब था कि कोई देखने वाला होता
तुम ने अरमान हमारा न निकाला न सही
अपने ख़ंजर का तो अरमान निकाला होता
दिल के हाथों न मिला चैन किसी रोज़ 'जलील'
ऐसे दुश्मन को न आग़ोश में पाला होता
ग़ज़ल
उस का जल्वा जो कोई देखने वाला होता
जलील मानिकपूरी

