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उस का जल्वा जो कोई देखने वाला होता | शाही शायरी
us ka jalwa jo koi dekhne wala hota

ग़ज़ल

उस का जल्वा जो कोई देखने वाला होता

जलील मानिकपूरी

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उस का जल्वा जो कोई देखने वाला होता
वादा-ए-दीद क़यामत पे न टाला होता

बाम पर थे वो खड़े लुत्फ़ दो-बाला होता
मुझ को भी दिल ने उछल कर जो उछाला होता

कैसे ख़ुश-रंग हैं ज़ख़्म-ए-जिगर ओ दाग़-ए-जिगर
हम दिखाते जो कोई देखने वाला होता

दिल न सँभला था अगर देख के जल्वा उस का
तू ने ऐ दर्द-ए-जिगर उठ के सँभाला होता

तुम जो पर्दे में सँवरते हो नतीजा क्या है
लुत्फ़ जब था कि कोई देखने वाला होता

तुम ने अरमान हमारा न निकाला न सही
अपने ख़ंजर का तो अरमान निकाला होता

दिल के हाथों न मिला चैन किसी रोज़ 'जलील'
ऐसे दुश्मन को न आग़ोश में पाला होता