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उस बुत-ए-काफ़िर को उन का ध्यान क्या है कुछ नहीं | शाही शायरी
us but-e-kafir ko un ka dhyan kya hai kuchh nahin

ग़ज़ल

उस बुत-ए-काफ़िर को उन का ध्यान क्या है कुछ नहीं

नूह नारवी

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उस बुत-ए-काफ़िर को उन का ध्यान क्या है कुछ नहीं
दीन क्या है कुछ नहीं ईमान क्या है कुछ नहीं

नज़्र करने के लिए सामान क्या है कुछ नहीं
जान है अब और मेरी जान क्या है कुछ नहीं

ख़ाक से पैदा हुआ ये ख़ाक में मिल जाएगा
ख़ाक-दान-ए-दहर में इंसान क्या है कुछ नहीं

चाहता हूँ मैं कि चाहें आप भी दिल से मुझे
है यही अरमान और अरमान क्या है कुछ नहीं

हर घड़ी ज़ुल्म-ओ-सितम हर दम वही क़हर-ओ-इताब
आप के नज़दीक मेरी जान क्या है कुछ नहीं

मैं फ़क़ीर-ए-बे-ग़रज़ हूँ बे-ग़रज़ के वास्ते
नफ़अ क्या है कुछ नहीं नुक़सान क्या है कुछ नहीं

मरने वाले लुटने वाले मिटने वाले के लिए
जान क्या है आन क्या है शान क्या है कुछ नहीं

तेग़ ने गर्दन जुदा की मौत ने ली जान-ए-ज़ार
मेरे सर पर आप का एहसान क्या है कुछ नहीं

जब कहो क़ुर्बान कर दूँ जब कहो कर दूँ निसार
ये ज़रा सा दिल ज़रा सी जान क्या है कुछ नहीं

क्या कहा हम को बहुत कुछ ग़म-ज़दों का ध्यान है
तुम को अपने ग़म-ज़दों का ध्यान क्या है कुछ नहीं

हर हसीं पर उस को मरना और उसे ग़म झेलना
दिल सलामत है तो मेरी जान क्या है कुछ नहीं

सर पटकने को फ़क़त दो-चार पत्थर रख लिए
और मेरे घर में अब सामान क्या है कुछ नहीं

ख़ैर जो ज़ुल्म-ओ-सितम करने थे वो तुम ने किए
पिछली बातों का हमें अब ध्यान क्या है कुछ नहीं

मैं ये उन से क्यूँ कहूँ तुम आशिक़ों की जान हो
जानता हूँ आशिक़ों की जान क्या है कुछ नहीं

हो गई ग़र्क़ाब दुनिया भर गया सारा जहाँ
अब तो कहिए 'नूह' का तूफ़ान क्या है कुछ नहीं