उन्हीं की शह से उन्हें मात करता रहता हूँ
सितमगरों की मुदारात करता रहता हूँ
यहाँ कोई नहीं सुनता हदीस-ए-दिल-ज़दगाँ
मगर मैं और तरह बात करता रहता हूँ
भला ये उम्र कोई कारोबार-ए-शौक़ की है
बस इक तलाफ़ी-ए-माफ़ात करता रहता हूँ
ये काएनात मिरे बाल-ओ-पर के बस की नहीं
तो क्या करूँ सफ़र-ए-ज़ात करता रहता हूँ
यहीं पे वार-ए-हरीफ़ाँ उठाना पड़ता है
यहीं हिसाब-ए-मुसावात करता रहता हूँ
अजब नहीं किसी कोशिश में कामराँ हो जाऊँ
मोहब्बतों की शुरूआत करता रहता हूँ
हमेशा कासा-ए-ख़ाली छलकता रहता है
फ़क़ीर हूँ सो करामात करता रहता हूँ
ग़ज़ल
उन्हीं की शह से उन्हें मात करता रहता हूँ
इरफ़ान सिद्दीक़ी

