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उन्हें आदत हमें लज़्ज़त सितम की | शाही शायरी
unhen aadat hamein lazzat sitam ki

ग़ज़ल

उन्हें आदत हमें लज़्ज़त सितम की

जलील मानिकपूरी

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उन्हें आदत हमें लज़्ज़त सितम की
उधर शमशीर इधर तक़दीर चमकी

कहूँ क्या दर्द-ए-दिल कब से बढ़ा है
निगाह-ए-लुत्फ़ तुम ने जब से कम की

क़दम चूमेंगे तेरे हो के पामाल
चलेंगे चाल हम नक़्श-ए-क़दम की

यहाँ तक उन के वा'दे झूट निकले
क़सम को भी हुई हाजत क़सम की

वो ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू बिखरी हुई थी
खुली चोरी नसीम-ए-सुब्ह-दम की

यहाँ तक उन को पास-ए-राज़-ए-ख़त था
कि ख़ामे की ज़बाँ पहले क़लम की

ज़मीं पर इस अदा से पाँव रक्खा
कि आँखें खुल गईं नक़्श-ए-क़दम की

कहाँ पीरी में वो रौशन-बयानी
ज़बाँ तो है चराग़-ए-सुब्ह-दम की

कहाँ हम और कहाँ बख़्शिश हमारी
'जलील' इक मौज भी अब्र-ए-करम की