उन्हें आदत हमें लज़्ज़त सितम की
उधर शमशीर इधर तक़दीर चमकी
कहूँ क्या दर्द-ए-दिल कब से बढ़ा है
निगाह-ए-लुत्फ़ तुम ने जब से कम की
क़दम चूमेंगे तेरे हो के पामाल
चलेंगे चाल हम नक़्श-ए-क़दम की
यहाँ तक उन के वा'दे झूट निकले
क़सम को भी हुई हाजत क़सम की
वो ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू बिखरी हुई थी
खुली चोरी नसीम-ए-सुब्ह-दम की
यहाँ तक उन को पास-ए-राज़-ए-ख़त था
कि ख़ामे की ज़बाँ पहले क़लम की
ज़मीं पर इस अदा से पाँव रक्खा
कि आँखें खुल गईं नक़्श-ए-क़दम की
कहाँ पीरी में वो रौशन-बयानी
ज़बाँ तो है चराग़-ए-सुब्ह-दम की
कहाँ हम और कहाँ बख़्शिश हमारी
'जलील' इक मौज भी अब्र-ए-करम की
ग़ज़ल
उन्हें आदत हमें लज़्ज़त सितम की
जलील मानिकपूरी

