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उन से गर फ़ैज़याब हो जाता | शाही शायरी
un se gar faizyab ho jata

ग़ज़ल

उन से गर फ़ैज़याब हो जाता

नूह नारवी

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उन से गर फ़ैज़याब हो जाता
माहताब आफ़्ताब हो जाता

जा सका मैं न बाम-ए-जानाँ तक
वर्ना आली-जनाब हो जाता

आगे तक़दीर की रसाई थी
मैं वहाँ बारयाब हो जाता

दिल लगाना सवाब था लेकिन
जी छुड़ाना अज़ाब हो जाता

'नूह' होते अगर न शाहिद-बाज़
मैं मुरीद-ए-जनाब हो जाता