उन से गर फ़ैज़याब हो जाता
माहताब आफ़्ताब हो जाता
जा सका मैं न बाम-ए-जानाँ तक
वर्ना आली-जनाब हो जाता
आगे तक़दीर की रसाई थी
मैं वहाँ बारयाब हो जाता
दिल लगाना सवाब था लेकिन
जी छुड़ाना अज़ाब हो जाता
'नूह' होते अगर न शाहिद-बाज़
मैं मुरीद-ए-जनाब हो जाता
ग़ज़ल
उन से गर फ़ैज़याब हो जाता
नूह नारवी

