EN اردو
उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए | शाही शायरी
un se do aankh se aansu bhi bahae na gae

ग़ज़ल

उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए

आशिक़ अकबराबादी

;

उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए
क़ब्र-ए-आशिक़ के निशाँ भी तो मिटाए न गए

हम मिटे भी तो मिटे ख़ाक जो हसरत न मिटी
हम गए भी तो गए क्या जो बुलाए न गए

बज़्म-ए-दुश्मन में अभी थे अभी अपने घर में
आ के यूँ बैठे कि जैसे कहीं आए न गए

बर्क़ कहिए कि छलावा जो चमक दिखला कर
इस तरह आए कि आए भी और आए न गए

हैं वो 'आशिक़' कि जगह पा के न निकले दिल से
याद आए तो जुनूँ मुझ से भुलाए न गए