उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए
क़ब्र-ए-आशिक़ के निशाँ भी तो मिटाए न गए
हम मिटे भी तो मिटे ख़ाक जो हसरत न मिटी
हम गए भी तो गए क्या जो बुलाए न गए
बज़्म-ए-दुश्मन में अभी थे अभी अपने घर में
आ के यूँ बैठे कि जैसे कहीं आए न गए
बर्क़ कहिए कि छलावा जो चमक दिखला कर
इस तरह आए कि आए भी और आए न गए
हैं वो 'आशिक़' कि जगह पा के न निकले दिल से
याद आए तो जुनूँ मुझ से भुलाए न गए
ग़ज़ल
उन से दो आँख से आँसू भी बहाए न गए
आशिक़ अकबराबादी

