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उन को दिमाग़-ए-पुर्सिश-ए-अहल-ए-मेहन कहाँ | शाही शायरी
un ko dimagh-e-pursish-e-ahl-e-mehan kahan

ग़ज़ल

उन को दिमाग़-ए-पुर्सिश-ए-अहल-ए-मेहन कहाँ

बेखुद बदायुनी

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उन को दिमाग़-ए-पुर्सिश-ए-अहल-ए-मेहन कहाँ
ये भी सही तो हम को मजाल-ए-सुख़न कहाँ

इक बूँद है लहू की मगर बे-क़रार है
दिल को छुपाए ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन कहाँ

तमकीन-ए-ख़ामुशी ने उन्हें बुत बना दिया
सब इस गुमान में हैं कि उन के दहन कहाँ

वो शाम-ए-वादा महव हैं आराइशों में और
पहुँचा है ले के मुझ को मिरा सू-ए-ज़न कहाँ

'बेख़ुद' न क्यूँ हों दूरी-ए-उस्ताद है मलूल
सोचो तो मारवाड़ कहाँ है दकन कहाँ