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उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है | शाही शायरी
ummid TuTi hui hai meri jo dil mera tha wo mar chuka hai

ग़ज़ल

उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है

अकबर इलाहाबादी

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उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है
जो ज़िंदगानी को तल्ख़ कर दे वो वक़्त मुझ पर गुज़र चुका है

अगरचे सीने में साँस भी है नहीं तबीअत में जान बाक़ी
अजल को है देर इक नज़र की फ़लक तो काम अपना कर चुका है

ग़रीब-ख़ाने की ये उदासी ये ना-दुरुस्ती नहीं क़दीमी
चहल पहल भी कभी यहाँ थी कभी ये घर भी सँवर चुका है

ये सीना जिस में ये दाग़ में अब मसर्रतों का कभी था मख़्ज़न
वो दिल जो अरमान से भरा था ख़ुशी से उस में ठहर चुका है

ग़रीब अकबर के गर्द क्यूँ में ख़याल वाइज़ से कोई कह दे
उसे डराते हो मौत से क्या वो ज़िंदगी ही से डर चुका है