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उम्मीद-ए-शौक़ हो या वादा-ए-राहत-ٖफ़िज़ा कोई | शाही शायरी
ummid-e-shauq ho ya wada-e-rahat-fiza koi

ग़ज़ल

उम्मीद-ए-शौक़ हो या वादा-ए-राहत-ٖफ़िज़ा कोई

ऋषि पटियालवी

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उम्मीद-ए-शौक़ हो या वादा-ए-राहत-ٖफ़िज़ा कोई
मरीज़-ए-इश्क़ को अच्छा नहीं करती दवा कोई

भरी दुनिया में अपने भी हैं बेगाने भी हैं लेकिन
नहीं हमदर्द अब मेरा तिरे ग़म के सिवा कोई

पुराना हो गया है ज़िक्र-ए-तौबा छोड़िए साक़ी
पुरानी हो तो ला कोई रखा कोई पिला कोई

मुझे ये अर्ज़ करनी है तुम्हारी बे-नियाज़ी से
तुम्हारी आरज़ू के बा'द कैसा मुद्दआ' कोई

ये अपनी अपनी आदत है ये अपनी अपनी फ़ितरत है
कोई है बंदा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो बे-वफ़ा कोई

ज़माने की निगाहों में गुनहगार-ए-वफ़ा हम हैं
न जाने क्यूँ नहीं होता हमारा फ़ैसला कोई

ये दिल अटके का सौदा है ये दिल आएगा क़िस्सा है
मोहब्बत की निगाहों में नहीं अच्छा बुरा कोई

समा कर दिल में पर्दा है निगाह-ए-शौक़ से या'नी
ख़ुद अपने आप से छुपता है अब काफ़िर-अदा कोई

'रिशी' हम हर किसी से हाल दिल का कह नहीं सकते
बड़ी मुश्किल से मिलता है कहीं दर्द-आश्ना कोई