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उमीद टूटी हुई ख़ाक-दाँ में रौशन है | शाही शायरी
umid TuTi hui KHak-dan mein raushan hai

ग़ज़ल

उमीद टूटी हुई ख़ाक-दाँ में रौशन है

मुनीर सैफ़ी

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उमीद टूटी हुई ख़ाक-दाँ में रौशन है
कोई चराग़ तो दिल के मकाँ में रौशन है

सुनहरी धूप का पत्ता ख़िज़ाँ में रौशन है
कि आइना कोई अब्र-ए-रवाँ में रौशन है

जुनूँ हमारा मकाँ ला-मकाँ में रौशन है
हमारी गर्द-ए-सफ़र आसमाँ में रौशन है

क़दम क़दम पे है अब ज़ीना-ए-ज़वाल तो क्या
सर-ए-ग़ुरूर हमारा जहाँ में रौशन है

कहाँ की वहशतें दीवार-ओ-बाम-ओ-दर पर हैं
अजीब ख़ौफ़ मिरे सेहन-ए-जाँ में रौशन हैं

'मुनीर' आँखों में चिंगारियाँ सी उड़ने लगीं
कोई तो चश्मा-ए-रेग-ए-रवाँ में रौशन है