उमीद टूटी हुई ख़ाक-दाँ में रौशन है
कोई चराग़ तो दिल के मकाँ में रौशन है
सुनहरी धूप का पत्ता ख़िज़ाँ में रौशन है
कि आइना कोई अब्र-ए-रवाँ में रौशन है
जुनूँ हमारा मकाँ ला-मकाँ में रौशन है
हमारी गर्द-ए-सफ़र आसमाँ में रौशन है
क़दम क़दम पे है अब ज़ीना-ए-ज़वाल तो क्या
सर-ए-ग़ुरूर हमारा जहाँ में रौशन है
कहाँ की वहशतें दीवार-ओ-बाम-ओ-दर पर हैं
अजीब ख़ौफ़ मिरे सेहन-ए-जाँ में रौशन हैं
'मुनीर' आँखों में चिंगारियाँ सी उड़ने लगीं
कोई तो चश्मा-ए-रेग-ए-रवाँ में रौशन है
ग़ज़ल
उमीद टूटी हुई ख़ाक-दाँ में रौशन है
मुनीर सैफ़ी

