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उमीद कोई नहीं आसरा भी कोई नहीं | शाही शायरी
umid koi nahin aasra bhi koi nahin

ग़ज़ल

उमीद कोई नहीं आसरा भी कोई नहीं

मोहसिन ज़ैदी

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उमीद कोई नहीं आसरा भी कोई नहीं
दवा भी कोई नहीं अब दुआ भी कोई नहीं

कुछ इतने हो गए बेज़ार अपने हाल से लोग
कि अपने हाल पे अब सोचता भी कोई नहीं

बताए कौन वहाँ क्या गुज़र गई किस पर
कि इस दयार से आया गया भी कोई नहीं

हिसार-ए-जाँ के वो उस पार ही तो रहता है
फ़क़त है शर्त-ए-सफ़र फ़ासला भी कोई नहीं

गुज़र हुआ जो कभी उस से मिल लिए वर्ना
सवाल उस से कुजा मुद्दआ' भी कोई नहीं

मिरे सुख़न ने मुझे रू-शनास सब से किया
वगर्ना चेहरे से पहचानता भी कोई नहीं

हमीं ने ख़ुद पे किए बंद सारे दर 'मोहसिन'
निकलना चाहें तो अब रास्ता भी कोई नहीं