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उमीद-ए-मेहर पर इक हसरत-ए-दिल हम भी रखते थे | शाही शायरी
umid-e-mehr par ek hasrat-e-dil hum bhi rakhte the

ग़ज़ल

उमीद-ए-मेहर पर इक हसरत-ए-दिल हम भी रखते थे

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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उमीद-ए-मेहर पर इक हसरत-ए-दिल हम भी रखते थे
तमन्ना वस्ल की ऐ माह-ए-कामिल हम भी रखते थे

कभी गुलज़ार दाग़-ए-इश्क़ से दिल हम भी रखते है
कभी इक ताज़ा गुलशन ऐ अनादिल हम भी रखते थे

किसी दिन तो वो बहर-ए-हुस्न आ कर ज़ेब-बर होता
कि आग़ोश-ए-तमन्ना शक्ल-ए-साहिल हम भी रखते थे

अलग तू बज़्म से उठ कर जो सुन लेता तो कह देते
कि कुछ कुछ इल्तिजा ऐ ज़ेब-ए-महफ़िल हम भी रखते थे

हमें बे-मौत क्यूँ मारा अजल तू किस लिए आई
हवा-ए-बोसा-ए-शमशीर-ए-क़ातिल हम भी रखते थे

हमारे दिल का उक़्दा क्यूँ न ऐ ग़ुंचा-दहन खोला
हवस बोसे की थी थोड़ी सी मुश्किल हम भी रखते थे

करें अब क्या कहाँ ढूँढें गँवाया कू-ए-गेसू में
कभी यादश-ब-ख़ैर ऐ हमदमो दिल हम भी रखते थे

हमारा इम्तिहाँ ओ क़दर-अंदाज़ लाज़िम था
दिल-ए-मजरूह-ओ-मुज़्तर जान-ए-बिस्मिल हम भी रखते थे

किया पामाल उस को क्यूँ न तुम ने साथ सब्ज़े के
तुम्हारे ज़ेर-ए-पा ऐ जान-ए-जाँ दिल हम भी रखते थे

नहीं अब कसरत-ए-दाग़-ए-जुनूँ से लाएक़-ए-हदिया
कभी दिल पेशकश करने के क़ाबिल हम भी रखते थे

हक़ारत से न देखो आज हम को ऐ परी-रूयो
कभी तुम सा कोई ज़ोहरा-शमाइल हम भी रखते थे

अजब है क्या हुई उल्फ़त वो ऐ जाँ दोनों जानिब की
यही दिल तुम भी रखते थे यही दिल हम भी रखते थे

यूँही शब भर जला करते थे याद-ए-शोला-ए-रुख़ में
यही सोज़िश कभी ऐ शम-ए-महफ़िल हम भी रखते थे

लब-ए-जाँ-बख़्श पर क्या फ़ौक़ देते चश्म-ए-फ़त्ताँ को
कि 'अंजुम' कुछ तमीज़-ए-हक़्क़-ओ-बातिल हम भी रखते थे