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उल्टी हर एक रस्म-ए-जहान-ए-शुऊर है | शाही शायरी
ulTi har ek rasm-e-jahan-e-shuur hai

ग़ज़ल

उल्टी हर एक रस्म-ए-जहान-ए-शुऊर है

इस्माइल मेरठी

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उल्टी हर एक रस्म-ए-जहान-ए-शुऊर है
सीधी सी इक ग़ज़ल मुझे लिखनी ज़रूर है

वहदत में ए'तिबार-ए-हुदूस-ओ-क़िदम नहीं
था जो बुतून में ये वही तो ज़ुहूर है

तारिक वही है जिस ने किया कल को इख़्तियार
यानी हरीस-तर है वही जो सुबूर है

मुतलक़ यगानगी है तो नज़दीक-ओ-दूर क्या
पहुँचा है जो क़रीब वही दूर दूर है

अस्ल-ए-हयात है यही कहते हैं जिस को मौत
जीने की आरज़ू है तो मरना ज़रूर है

इक़रार-ए-बंदगी है ख़ुदाई का इद्दआ
इज्ज़-ओ-नियाज़ क्या है कमाल-ए-ग़ुरूर है

उम्मीद कीजिए अगर उम्मीद कुछ नहीं
ग़म खाइए बहुत जो ख़याल-ए-सुरूर है

ज़ुल्फ़-ए-सियाह से रुख़-ए-ताबाँ का हुस्न है
कहते हो जिस को देव हक़ीक़त में हूर है

बे-मासियत ख़ज़ाना-ए-रहमत है राएगाँ
सच पूछिए तो जुर्म न करना क़ुसूर है

इज़हार-ए-जान-ए-पाक है जिस्म-ए-कसीफ़ से
बे-पर्दगी हिजाब है ज़ुल्मत ही नूर है

बिलइत्तिफ़ाक़ हस्ती-ए-वहमी है निय्यती
हुशियार है जो नश्शा-ए-ग़फ़लत में चूर है

आला था जिस का रुत्बा वो असफ़ल में है असीर
सफ्फ-ए-नआल मोक़िफ़-ए-सदरुस्सुदूर है

है राह की तलाश तो कर गुमरही तलब
आक़िल वही है अक़्ल में जिस की फ़ुतूर है

बेदारी-ए-वजूद है ख़्वाब-ए-अदम में ग़र्क़
लब बंद हो गए यही शोर-ए-नुशूर है

हर चंद शग़्ल-ए-शेर नहीं आज-कल ज़रूर
नज़राना पीर जी के लिए कुछ ज़रूर है