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उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला | शाही शायरी
ulfat-e-ariz-e-laila mein pareshan nikla

ग़ज़ल

उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला

मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

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उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला
क़ैस मानिंद-ए-सहर चाक-गरेबाँ निकला

बन गए ख़ूब हदफ़ उस सितम-ईजाद के आप
लीजिए हज़रत-ए-दिल आज तो अरमाँ निकला

न हुई ताक़त-ए-नज़्ज़ारा किसी आशिक़ को
शोला-ए-हुस्न हिजाब-ए-रुख़-ए-जानाँ निकला

आ गई सदमा-ए-फ़ुर्क़त से अजल आशिक़ की
हिज्र-ए-महबूब फ़िराक़-ए-जसद-ओ-जाँ निकला

रूह ने ख़ाना-ए-तन छोड़ दिया आख़िर-कार
मेज़बाँ हम जिसे समझे थे वो मेहमाँ निकला

साफ़-दिल बहर-ए-जहाँ में नहीं रखते दौलत
चश्मा-ए-महर से कब गौहर-ए-ग़लताँ निकला

तू वो है हुस्न में यकता कि तजस्सुस में तिरे
आसमाँ ले के चराग़-ए-मह-ए-ताबाँ निकला

वो परी-रू हुआ क़िस्मत से मिरी मेरा मुतीअ
ख़त-ए-तक़्दीर ख़त-ए-मोहर-ए-सुलैमाँ निकला

मेरे मरने से हुए सैकड़ों अरमान शहीद
'आलिम' अंजाम में दिल गंज-ए-शहीदाँ निकला