उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला
क़ैस मानिंद-ए-सहर चाक-गरेबाँ निकला
बन गए ख़ूब हदफ़ उस सितम-ईजाद के आप
लीजिए हज़रत-ए-दिल आज तो अरमाँ निकला
न हुई ताक़त-ए-नज़्ज़ारा किसी आशिक़ को
शोला-ए-हुस्न हिजाब-ए-रुख़-ए-जानाँ निकला
आ गई सदमा-ए-फ़ुर्क़त से अजल आशिक़ की
हिज्र-ए-महबूब फ़िराक़-ए-जसद-ओ-जाँ निकला
रूह ने ख़ाना-ए-तन छोड़ दिया आख़िर-कार
मेज़बाँ हम जिसे समझे थे वो मेहमाँ निकला
साफ़-दिल बहर-ए-जहाँ में नहीं रखते दौलत
चश्मा-ए-महर से कब गौहर-ए-ग़लताँ निकला
तू वो है हुस्न में यकता कि तजस्सुस में तिरे
आसमाँ ले के चराग़-ए-मह-ए-ताबाँ निकला
वो परी-रू हुआ क़िस्मत से मिरी मेरा मुतीअ
ख़त-ए-तक़्दीर ख़त-ए-मोहर-ए-सुलैमाँ निकला
मेरे मरने से हुए सैकड़ों अरमान शहीद
'आलिम' अंजाम में दिल गंज-ए-शहीदाँ निकला
ग़ज़ल
उल्फ़त-ए-आरिज़-ए-लैला में परेशाँ निकला
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

