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उड़ाऊँ न क्यूँ तार-तार-ए-गरेबाँ | शाही शायरी
uDaun na kyun tar-tar-e-gareban

ग़ज़ल

उड़ाऊँ न क्यूँ तार-तार-ए-गरेबाँ

ग़ुलाम मौला क़लक़

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उड़ाऊँ न क्यूँ तार-तार-ए-गरेबाँ
कि पर्दा-दरी है शिआ'र-ए-गरेबाँ

हर इक तार है दस्त-गीर-ए-तमाशा
किया ज़ोफ़ ने शर्मसार-ए-गरेबाँ

कतान-ओ-गुल-ओ-सीना-ए-अहल-ए-हसरत
बहुत चीज़ हैं यादगार-ए-गरेबाँ

अगर दुश्मनी बख़िया-गर को नहीं
तो क्यूँ इस क़दर दोस्त-दार-ए-गरेबाँ

यहीं क़ैद-ए-रस्म ख़लाइक़ पसंद
हर इक साँस है ख़ार-ख़ार-ए-गरेबाँ

वफ़ा है मिरी पेश-दस्त-ए-सलासिल
तिरा पर्दा है पेश-कार-ए-गरेबाँ

ये उड़ने में चालाक हर पारा है
रम-ए-दश्त-ए-वहशत शिकार-ए-गरेबाँ

कभी कोह में दश्त में है कभी
नहीं कुछ गुलू पर मदार-ए-गरेबाँ

'क़लक़' क्यूँ के पर्दा न उठता हमारा
कि है बख़िया-गर राज़-दार-ए-गरेबाँ