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उदासियाँ सहर-ओ-शाम की नहीं अच्छी | शाही शायरी
udasiyan sahar-o-sham ki nahin achchhi

ग़ज़ल

उदासियाँ सहर-ओ-शाम की नहीं अच्छी

जिगर बरेलवी

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उदासियाँ सहर-ओ-शाम की नहीं अच्छी
'जिगर' ये ख़ू दिल-ए-नाकाम की नहीं अच्छी

छलक चले न कहीं ज़र्फ़ ऐ दिल-ए-मख़मूर
बहुत हवस मय-ए-गुलफ़ाम की नहीं अच्छी

उन्हीं को करती है बे-ख़ानुमाँ जो बे-घर हैं
रविश ये गर्दिश-ए-अय्याम की नहीं अच्छी

किसी की शान-ए-तग़ाफ़ुल से है वक़ार-ए-नाज़
उमीद नामा-ओ-पैग़ाम की नहीं अच्छी

सिवाए कश्मकश-ओ-इज़्तिराब क्या हासिल
कुरेद क़िस्मत ओ अंजाम की नहीं अच्छी

दिल-ए-हज़ीं न कहीं इश्क़ बद-गुमाँ हो जाए
तलाश राहत-ओ-आराम की नहीं अच्छी

कहीं ये फूलों के ईमा से हों न मुर्ग़-ए-असीर
शिकायतें क़फ़स-ओ-दाम की नहीं अच्छी

'जिगर' ये याद कहीं ज़हर हो न जाए तुम्हें
जो रट लगी है किसी नाम की नहीं अच्छी