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तू वो हिन्दोस्ताँ में लाला है | शाही शायरी
tu wo hindostan mein lala hai

ग़ज़ल

तू वो हिन्दोस्ताँ में लाला है

शाद लखनवी

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तू वो हिन्दोस्ताँ में लाला है
जिस का दाग़ी ग़ुलाम लाला है

हाथ वहशत से रोक ऐ मजनूँ
पाँव पड़ता हर एक छाला है

बे-मय-ओ-नाँ हूँ मैं वो ग़ैरों से
हम-पियाला है हम-निवाला है

दिल-ए-हर-शैख़-ओ-बरहमन है जुदा
कहीं मस्जिद कहीं शिवाला है

उस के आने से तन में जान आई
दम-ए-आख़िर लिया सँभाला है

चुप रहूँ क्या मैं सूरत-ए-नाक़ूस
दिल है शक़ जब लबों पे नाला है

क्यूँ न सिमरन पढ़े बशर ऐ 'शाद'
आदमी हड्डियों का माला है