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तू अपने होने का हर इक निशाँ सँभाल के मिल | शाही शायरी
tu apne hone ka har ek nishan sambhaal ke mil

ग़ज़ल

तू अपने होने का हर इक निशाँ सँभाल के मिल

फ़रहत अब्बास शाह

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तू अपने होने का हर इक निशाँ सँभाल के मिल
यक़ीं सँभाल के मिल और गुमाँ सँभाल के मिल

हम अपने बारे कभी मुश्तइ'ल नहीं होते
फ़क़ीर लोग हैं हम से ज़बाँ सँभाल के मिल

वजूद-ए-वाहिमा वीरानियों में घूमता है
ये बे-कराँ है तो फिर बे-कराँ सँभाल के मिल

ये मरहले हैं अजब इस लिए समुंदर से
हुआ को थाम के मिल बादबाँ सँभाल के मिल

अगरचे दोस्त हैं सारे ही आस-पास मगर
उसूल ये है कि तीर-ओ-कमाँ सँभाल के मिल

तू कैसी ग़ैर-यक़ीनी फ़ज़ा में मिलता है
कोई तो लम्हा कभी दरमियाँ सँभाल के मिल

फिर उस के बा'द तो शायद रहे रहे न रहे
तमाम उम्र का सूद-ओ-ज़ियाँ सँभाल के मिल