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तुंद-ख़ूई पे तंज़ कर जाऊँ | शाही शायरी
tund-KHui pe tanz kar jaun

ग़ज़ल

तुंद-ख़ूई पे तंज़ कर जाऊँ

ख़ालिद अहमद

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तुंद-ख़ूई पे तंज़ कर जाऊँ
बन के ख़ुश्बू हवा के घर जाऊँ

दुश्मन-ए-जाँ नफ़स नफ़स मेरा
धूल का फूल हूँ किधर जाऊँ

तू भुलाए तो क्या भुलाए मुझे
नश्शा हूँ किस तरह उतर जाऊँ

ख़ुद उलझता हूँ ख़ुद सुलझता हूँ
कुछ निखर जाऊँ कुछ सँवर जाऊँ

जिस्म और इश्क़ के हवाले से
मैं तिरी रूह में उतर जाऊँ

बुत को देखा तो बुत हुआ 'ख़ालिद'
जी में था देख कर गुज़र जाऊँ