तुम्हें मुझ में क्या नज़र आ गया जो मिरा ये रूप बना गए
वो तमाम लोग जो इश्क़ थे वो मिरे वजूद में आ गए
न तिरे सिवा कोई लिख सके न मिरे सिवा कोई पढ़ सके
ये हुरूफ़-ए-बे-वरक़-ओ-सबक़ हमें क्या ज़बान सिखा गए
न कर आज हम से ये गुफ़्तुगू मुझे क्यूँ हुई तिरी जुस्तुजू
अरे हम भी एक ख़याल थे सो तिरे भी ज़ेहन में आ गए
जो सुना कि घर तिरे जाएँगे तिरे सेहन ओ बाग़ सजाएँगे
मिरे अश्क उड़ के हवा के साथ उन्ही बादलों में समा गए
दिल-ए-शब में सुब्ह की धड़कनें अभी इब्तिदा-ए-ग़ज़ल में थीं
कि वो आए और तमाम शेर मिरी ही धुन में सुना गए
जो न आप उस पे हुए अयाँ ये रखेगा हम को भी सर-गिराँ
कई बार ले के शिकायतें मिरे दोस्त अर्ज़ ओ समा गए
कई महफ़िलों में तो यूँ हुआ कि जब आए 'आली'-ए-ख़ुश-अदा
जो न खुल सके तो छुपे रहे जो न रो सके तो रुला गए
ग़ज़ल
तुम्हें मुझ में क्या नज़र आ गया जो मिरा ये रूप बना गए
जमीलुद्दीन आली

