तुम्हारा अद्ल-ए-जहाँगीर और ही कुछ है
मिरी ख़ता मिरी तक़्सीर और ही कुछ है
बयान-ए-वाइ'ज़-ए-रंगीं-नवा है ख़ूब मगर
हमारे शहर की तस्वीर और ही कुछ है
किताब में जो लिखा है दुरुस्त है लेकिन
हमारे ख़्वाब की ता'बीर और ही कुछ है
हसीन-तर है फ़रोग़-ए-नज़र है हुस्न-ए-जहाँ
तुम्हारा हुस्न-ए-हमा-गीर और ही कुछ है
सुख़न-वरों ने इज़ाफ़े किए ग़ज़ल में बहुत
मक़ाम-ए-मीर-तक़ी-'मीर' और ही कुछ है
ग़ज़ल
तुम्हारा अद्ल-ए-जहाँगीर और ही कुछ है
सुलतान रशक

