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तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते हो | शाही शायरी
tumko kahte hain ki aashiq ki fughan sunte ho

ग़ज़ल

तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते हो

मीर मोहम्मदी बेदार

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तुम को कहते हैं कि आशिक़ की फ़ुग़ाँ सुनते हो
ये तो कहने ही की बातें हैं कहाँ सुनते हो

चाह का ज़िक्र तुम्हारी मैं किया किस आगे
कौन कहता है ''कहो'' किस की ज़बाँ सुनते हो

कशिश-ए-इश्क़ ही लाई है तुम्हें याँ वर्ना
आप से था न मुझे ये तो गुमाँ सुनते हो

एक शब मेरा भी अफ़्साना-ए-जाँ-सोज़ सुनो
क़िस्से औरों के तो ऐ जान-ए-जहाँ सुनते हो

वो गुल-अंदाम जो आया तो ख़जालत से तमाम
ज़र्द हो जाओगे ऐ लाला-रुख़ाँ सुनते हो

एक के लाख सुनाऊँगा ख़बर-दार रहो
इस तरफ़ आई अगर तब्-ए-रवाँ सुनते हो

आज क्या है कहो क्यूँ ऐसे ख़फ़ा बैठे हो
अपनी कहते हो न मेरी ही मियाँ सुनते हो

कौन है किस से करूँ दर्द-ए-दिल अपना इज़हार
चाहता हूँ कि सुनो तुम तो कहाँ सुनते हो

ये वही शोख़ है आता है जो 'बेदार' के साथ
जिस को ग़ारत-गर-ए-दिल आफ़त-ए-जाँ सुनते हो