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तुम जल्वा दिखाओ तो ज़रा पर्दा-ए-दर से | शाही शायरी
tum jalwa dikhao to zara parda-e-dar se

ग़ज़ल

तुम जल्वा दिखाओ तो ज़रा पर्दा-ए-दर से

अमजद नजमी

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तुम जल्वा दिखाओ तो ज़रा पर्दा-ए-दर से
हम थक गए नज़्ज़ारा-ए-ख़ुरशीद-ओ-क़मर से

मजबूर-ए-नुमाइश नहीं कुछ हुस्न ही उन का
हम भी तो हैं मजबूर तक़ाज़ा-ए-नज़र से

बछड़ा हुआ जैसे कोई मिलते ही लिपट जाए
यूँ तीर तिरा आ के लिपटता है जिगर से

कटते नहीं क्यूँ शाम-ए-जुदाई के ये लम्हे
मिलती नहीं क्यूँ ज़ुल्मत-ए-शब जा के सहर से

करना है किसी दिन उसे हम-दोश-ए-सुरय्या
है आह अभी तक मिरी महरूम असर से

हो जाएँ हमेशा के लिए आप जो मेरे
मैं माँग लूँ कुछ उम्र यहाँ उम्र-ए-ख़िज़र से

ऐसा तो न कर पाएगा कोई भी फ़ुसूँ-कार
वो कर गए जो सादगी-ए-हुस्न-ए-नज़र से

आसूदा-ए-मंज़िल नहीं आगाह-ए-सऊबत
महरूम है वो लज़्ज़त-ए-दूरी-ए-सफ़र से