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तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं | शाही शायरी
tum ho sharik-e-gham to mujhe koi gham nahin

ग़ज़ल

तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

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तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं
दुनिया भी मिरे वास्ते जन्नत से कम नहीं

चाहा है तुझ को तुझ पे लुटाई है ज़िंदगी
तेरे अलावा कुछ मिरा दीन-ओ-धरम नहीं

वो बद-नसीब राहत-ए-हस्ती न पा सका
जिस पे मिरे हबीब की चश्म-ए-करम नहीं

मैं बंदा-ए-सनम सही काफ़िर सही मगर
पाए मिरा मक़ाम किसी में ये दम नहीं

उस रास्ते में सर को झुकाना हराम है
जिस रास्ते में आप का नक़्श-ए-क़दम नहीं

ऐ आने वाले अपनी जबीं को झुका कर आ
ये आस्तान-ए-यार है कू-ए-हरम नहीं

अहल-ए-जुनूँ का इस लिए मशरब जुदा रहा
वाक़िफ़ नियाज़-ए-इश्क़ से शैख़-ए-हरम नहीं

मुंकिर रह-ए-वफ़ा में 'फ़ना' किस तरह से हो
मेरा जहाँ में कोई वजूद-ओ-अदम नहीं